आचार्य चाणक्य कहते हैं in Sanskrit with Meaning in Hindi

?आचार्य चाणक्य कहते हैं?
?द्वादशोऽध्यायः?

जलविन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः।
स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च॥१९॥
*?शब्दार्थ* :— *क्रमशः*= क्रमपूर्वक *जल-विन्दु-निपातेन*= पानी की एक बूंद गिरने से *धटः*= घड़ा *पूर्यते*= भर जाता है *सः*= यही धीरे-धीरे थोड़ा-थोड़ा संचय करते जाना *सर्वविद्यानाम्*= सब विद्याओं की *च*= और *धर्मस्य*= धर्म की *च*= तथा *धनस्य*= धन की प्राप्ति का *हेतुः*= कारण है।

*?भावार्थ* :— उपर्युक्त श्लोक में आचार्य चाणक्य कहते हैं कि जिस प्रकार बूँद-बूँद से घड़ा भर जाता है, बूँद-बूँद के मिलने से नदी बन जाती है, पाई-पाई जोड़ने पर व्यक्ति धनवान बन जाता है। उसी प्रकार यदि निरंतर अभ्यास किया जाए तो मनुष्य के लिए कोई विद्या अप्राप्य नहीं रहती। ऐसे ही यदि मनुष्य धर्मयुक्त शुभ कर्म में लीन रहे तो एक दिन उसके पास पुण्यों का अथाह भंडार संचय हो जाता है। इसलिए मनुष्य को अपना अधिकतर समय सत्कर्मों में ही व्यतीत करना चाहिए।

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